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New Delhi, India
Vrijeme pridruživanja: studeni 2013.
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  1. prije 6 sati

    ।।बालकाण्ड।। सठ सेवक की प्रीति रुचि रखिहहिं राम कृपालु। उपल किए जलजान जेहिं सचिव सुमति कपि भालु॥28 क॥ अर्थ:-तथापि कृपालु श्री रामचन्द्रजी मुझ दुष्ट सेवक की प्रीति और रुचि को अवश्य रखेंगे, जिन्होंने पत्थरों को जहाज और बंदर-भालुओं को बुद्धिमान मंत्री बना लिया॥28 (क)॥

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  2. prije 6 sati

    ।। श्रीमद्भगवद्गीता।। न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति भावार्थ: इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र करने वाला निःसंदेह कुछ भी नहीं है।उस ज्ञान को कितने ही काल से कर्मयोग द्वारा शुद्धान्तःकरण हुआ मनुष्य अपने-आप ही आत्मा में पा लेता है॥

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  3. prije 6 sati

    महानता के लिए छोटी छोटी बातों को आयोजित करना पड़ता है. महान व्यक्तित्व एक ही दिन में तैयार नहीं होते, वे तो चुपचाप धीरे धीरे क्रमवार रीती से बढते हैं और त्याग प्रेम और आदर्श उनके व्यक्तित्व को महान बनाते हैं: परमपूज्य श्रीगुरुजी

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    विश्वास नहीं होता कि ऐसी नीच राजनीति kar sakta hai

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    : हमारी शुरुआती जांच में हमें कपिल के फोन से कुछ तस्वीरें मिलीं जो ये दर्शाती हैं कि वो आम आदमी पार्टी से है और उसने पहले ही खुलासा कर दिया है कि वह और उसके पिता एक साल पहले AAP में शामिल हुए हमने उसका 2 दिन का रिमांड लिया है।-राजेश देव, डीसीपी क्राइम ब्रांच

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    3. velj

    शर्मनाक; कौन कहता है कि एम्बुलेंस और स्कूली बच्चो को रास्ता देता है, ये तस्वीर देखिये के बंद रास्ते से वापस लौटती एम्बुलेंस, इसमें मरीज़ था और उन्हें आनन्द विहार जाना था।

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  7. 4. velj

    सम्पूर्ण राष्ट्र के प्रति आत्मीयता का भाव केवल शब्दों में रहने से काम नहीं चलेगा, आत्मयिता की प्रत्यक्ष अनुभूति आवश्यक है। समाज के सुख-दुःख यदि हम छू पाते है, तो यही मानना चाहिए, कि यह अनुभूति का कोई अंश हमें भी प्राप्त हुआ: परमपूज्य श्री गुरुजी

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  8. 4. velj

    ।।बालकाण्ड।। रीझत राम सनेह निसोतें। को जग मंद मलिनमति मोतें॥6॥ अर्थ:-श्री रामजी तो विशुद्ध प्रेम से ही रीझते हैं, पर जगत में मुझसे बढ़कर मूर्ख और मलिन बुद्धि और कौन होगा?॥6॥

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  9. 4. velj

    ।। श्रीमद्भगवद्गीता।। यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन । ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा ॥ भावार्थ : क्योंकि हे अर्जुन! जैसे प्रज्वलित अग्नि ईंधनों को भस्ममय कर देता है, वैसे ही ज्ञानरूप अग्नि सम्पूर्ण कर्मों को भस्ममय कर देता है॥37॥

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    गर्व से कागज़ दिखाएंगे।

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  11. 3. velj

    हमारे समाज पर हुए निरंतर आघातों के बाद भी हम जीवित हैं. उसका मूल कारण हमारी समाज रचना ही है , जो आज भी विश्व को शांति का मार्ग बताने में समर्थ है. युद्ध ना हो विश्व में शांति हो सब लोग सुखी हो परस्पर वैमनस्य ना हो यह हमारी संस्कृति की कल्पना है: परमपूज्य श्री गुरुजी

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  12. 3. velj

    ।।बालकाण्ड।। सुनि सनमानहिं सबहि सुबानी। भनिति भगति नति गति पहिचानी॥ यह प्राकृत महिपाल सुभाऊ। जान सिरोमनि कोसलराऊ॥5॥

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  13. 3. velj

    ।। श्रीमद्भगवद्गीता।। अपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृत्तमः । सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं सन्तरिष्यसि ॥ भावार्थ : यदि तू अन्य सब पापियों से भी अधिक पाप करने वाला है, तो भी तू ज्ञान रूप नौका द्वारा निःसंदेह सम्पूर्ण पाप-समुद्र से भलीभाँति तर जाएगा॥36॥

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  14. 2. velj

    जिस प्रकार अयोग्य सेनापति द्वारा सेना का कुशल सञ्चालन नहीं हो सकता उसी पकारा कार्यकर्ता अकुशल हो तो शाखाएं ठीक नहीं चल सकती. अतः प्रत्येक कार्यकर्ता को संघ का शिक्षण करना अनिवार्य है. ये वर्ग हमे कठिनाईयों में भी ध्येय का स्मरण रखते हुए संघ कार्य सिखाता है: परमपूज्य श्रीगुरुजी

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  15. 2. velj

    ।।बालकाण्ड।। सुकबि कुकबि निज मति अनुहारी। नृपहि सराहत सब नर नारी॥ साधु सुजान सुसील नृपाला। ईस अंस भव परम कृपाला॥4॥ अर्थ:-सुकवि-कुकवि, सभी नर-नारी अपनी-अपनी बुद्धि के अनुसार राजा की सराहना करते हैं और साधु, बुद्धिमान, सुशील, ईश्वर के अंश से उत्पन्न कृपालु राजा-॥4॥

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  16. 2. velj

    ।। श्रीमद्भगवद्गीता।। यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव । येन भुतान्यशेषेण द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि ॥

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    आजादी के मूल मंत्र में एक भावना थी आत्मनिर्भर भारत। आत्मनिर्भर भारत तब बनता है जब हर भारतीय भारत में बनी हर वस्तु पर गर्व करे। मैं प्रत्येक भारतीय से भी आग्रह करूंगा वो स्थानीय उत्पादों को प्राथमिकता दें। - महामहिम राष्ट्रपति श्री रामनाथ कोविंद जी

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  19. 1. velj

    छोटी-छोटी बातों को नित्य ध्यान रखें बूंद बूंद मिलकर ही बड़ा जलाशय बनता है. एक एक त्रुटि मिलकर ही बड़ी बड़ी गलतियां होती है, इसलिए शाखाओं में जो शिक्षा मिलती है. उसके किसी भी अंश को नगण्य अथवा कम महत्व का नहीं मानना चाहिए: परमपूज्य श्रीगुरुजी

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  20. 1. velj

    ।।बालकाण्ड।। लोकहुँ बेद सुसाहिब रीती। बिनय सुनत पहिचानत प्रीती॥ गनी गरीब ग्राम नर नागर। पंडित मूढ़ मलीन उजागर॥3॥ अर्थ:-लोक और वेद में भी अच्छे स्वामी की यही रीति प्रसिद्ध है कि वह विनय सुनते ही प्रेम को पहचान लेता है। अमीर-गरीब, गँवार-नगर निवासी, पण्डित-मूर्ख, बदनाम-यशस्वी॥3॥

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