मेरा हिमालय =============== इस हिमालय पर्वतश्रृगों में मेरू पर्वत विश्व में विख्यात है। और पांच योजन से भी अधिक लम्बा है। जिसमें देवता निवास करते हैं। महाभारत के प्रथम पर्व के अनुसार पाण्डवराज के सतोपंथ हेमकुण्ड सप्तश्रंग पर्वत शिखर के नीचे शिला पर बैठकर तपस्या की थी।
आज भी यह शिला इस स्थान पर विद्यमान है। महाभारत युद्ध के बाद पांचों पांण्डवों ने आकर हिमालय में समाधि ली थी। इन्होंने पाण्डुकेश्वर पहुंचकर अपने पूर्वज पाण्डुराज की स्मृति में मंदिर का निर्माण किया जो कि पाण्डुराज के नाम से यह मन्दिर आज भी विद्यमान है।
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लोकपाल से लगभग चार किलोमीटर की दूरी पर काकभूषण्डी ताल है। ग्रामीणों की मान्यता है कि आज भी काकभूषण्डी इस स्थान पर निवास करते हैं। यह तिकोनाताल है जिसकी लम्बाई अधिक एवं चौड़ाई कम है, हेमकुण्ड में लक्ष्मण जी का प्राचीन मन्दिर है।
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हेमकुण्ड में गुरू गोविन्द सिंह महाराज का पवित्र गुरूद्वारा है। सन् 1932 के आसपास सन्तसोहन सिंह जी हेमकुण्ड आए उनकी प्रेरणा से इस स्थान पर गुरूद्वारा का निर्माण कार्य प्रारम्भ किया गया।
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इन गुरू भक्तों की मान्यता है कि गुरूगोविन्द सिंह महाराज ने हेमकुण्ड में आकर तपस्या की थी जो कि आज सिखों का प्रमुख तीर्थ स्थान बन गया है। प्रतिवर्ष हजारों की संख्या में सिख तीर्थ यात्री इस तीर्थ पर पहुंचकर पवित्र सरोवर में स्नान करते हैं।
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