मेरा हिमालय ============= 'उत्तराखण्ड हिमालय' से भागीरथी, अलकनन्दा, सरस्वती, यमुना, मंदाकिनी आदि कतिपय पावन नदियां निकलती हैं। लेकिन मां 'गंगा' के लिए श्रेष्ठ पवित्र भावना केवल भारतीयों में ही नहीं अपितु पूरे विश्व के लोगों में है।
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इसी कारण शिवजी नीलकंठ कहलाए। इस विषाग्नि की शांति हेतु शिवजी को 'गंगाजल' चढ़ाने का महत्व है। इसी पवित्र भावना से आज भी गंगोत्री से जल लेकर रामेश्वरम में शिवजी को श्रद्धालुजन जल चढ़ाते हैं।
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इसी पवित्र भावना से आदि गुरू 'शंकराचार्य' ने गंगोत्री हिमालय से कन्याकुमारी रामेश्वरम तक सभी को एक सूत्र में बांधा जा सके इस परम्परा का सूत्रपात किया। गंगावतरण की अनेक पौराणिक मान्यतायें हैं। आज भी गंगाजल में औषधीय गुण विद्यमान हैं।
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इस पवित्र गंगाजल को बोतलों में देश और विदेश में ले जाया जाता है लेकिन इस जल में कोई प्रदुषण नहीं आता। आधुनिक वैज्ञानिक भी इस बात को स्वीकार करते हैं कि गंगा के जल में ऐसे रसायन घुल कर आते हैं जो पानी को सड़ने से बचाते हैं।
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औषधिराज हिमालय में अनेक किस्म की जड़ी- बूटियां होने के कारण गंगा जी का जल प्रदुषित नहीं होता है।
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