उपचार हेतु कतिपय वैज्ञानिक संगोष्ठियां का आयोजन कर आयुर्वेदिक संहिताओं का सृजन किया। यही कारण है कि देवभूमि 'उत्तराखण्ड हिमालय' को महर्षि 'चरक' ने जड़ी -बूटियों के लिए सर्वश्रेष्ठ बताया है। यथा- 'औषधीनां पराभूमि हिमवान् शैल सत्तमः स्वयं'
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महर्षि चरक- यायावर के रूप में उत्तराखण्ड हिमालय की घाटियों, पर्वत, शिखरों में पर्यटन कर जड़ी- बूटियों की खोज का स्पष्ट प्रमाण मिलता है कि पौड़ी के कोटद्वार तहसील, दोगड्डा विकासखंड के एक शिखर का नाम 'चरख डाण्डा' है।
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बाल्मीकि रामायण में वर्णित 'संजीवनी परिवार' की दिव्यौषधियां का पर्वत 'द्रोणागिरि' भी तो उत्तराखण्ड हिमालय में ही विद्यमान है।
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