न तो यह पर्वताश्रेणी यज्ञों से पवित्र हुई, न तपों से परितप्त हुई। जिन स्थानों की पुराणों ने महिमा गाई है वे हैं उत्तराखण्ड के बद्रीनाथ, कैलाश, हेमकूट, गंधमादन, गंगा, अलकनन्दा, मंदाकिनी, और यमुना आदि का क्षेत्र। आज का भौगोलिक कैलाश चीन में है, पर पुराणों का कैलाश
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इससे कहीं अधिक व्याप्त और विस्तृत रहा है। पुराणों के आधार पर यह निश्चित होता है यह सारे के सारे उपरोक्त क्षेत्र कैलाश के ही अन्तर्गत माने गये हैं। और पुराणों ने भी इन्हीं क्षेत्रों की महिमा गाई है, क्योंकि इन्हीं स्थानों पर अनेक यज्ञ हुए हैं।
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तपस्वियों ने इन्हीं स्थानों पर अनेक तप किये हैं। इन्हीं स्थानों पर देवताओं का विचरण हुआ है। इन्हीं स्थानों को शिव- पार्वती के भ्रमण ने पुनीत किया है। इसलिये यही पवित्र स्थान है और आज भी उनकी पवित्रता ज्यों की त्यों स्वीकृत है।
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जैसे प्राचीनकाल में यह भूमि यज्ञों से पवित्र हुई और तपों से तप्त हुई।
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भारतस्य उत्तरदिशि स्थितः हिमालयः अचलः देवस्वरूपः च अस्ति। हिमालयः पर्वतराजः कथ्यते यतोहि सः समस्तविश्वस्य पर्वतेषु सर्वोच्चः अस्ति। अस्य पूर्वदिशि सागर: अपि च पश्चिमदिशि अपर: सागरः वर्तते अतः अयं पृथिव्याः मानदण्डः इव प्रतीयते।
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[09/05, 10:14 PM] maheshsanchit: अस्त्युत्तरस्यां दिशि देवतात्मा हिमालयो नाम नगाधिराजः। पूर्वापरौ तोयनिधी वगाह्य स्थितः पृथिव्या इव मानदण्डः।।
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