सकता है कि प्राचीनकाल से ही हिमालय में वृक्षारोपण की परम्परा चली आई है जिसका सीधा सम्बन्ध धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष से है। शारड्गर्धर संहिता में स्पष्ट प्रमाण मिलता है कि अपुत्रवान् व्यक्ति परलोक ऐषणा के हेतु मार्ग में वृक्षों का रोपण करे तो बहुत बड़ा पुण्य होता है, इस तरह के
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प्रमाण मिलते हैं। इसी काल में यहां पर किरात, पुलिन्द, तगण आदि जाति और ऋषि- मुनियों के अतिरिक्त सर्वसाधारण के लिए यह स्थान अगम्य था। सम्भवतः यही कारण था कि हिमालय के घने वन, औषधियों के लिए अब भी प्रसिद्ध हैं।
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मेरे गाँव मे सड़क जब आएगी...तब तक पूरा गाँव शहर आजायेगा..माननीय मंत्री महोदय धनसिंह रावत जी को मर्म के साथ संदेश ज़रूर पहुंचा दीजियेगा।
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अब ऐसा ही होने वाला है..गांव जनविहीन हो रहे है...1680 गांव बज़र हो गए है..और आगे संख्या बढ़ती रहेगी..फिर पेड़ ही रहेंगे...
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