पाणिनी के वर्णन से पता चलता है कि पश्चिम से वाह्लीक से शुरू होकर दरद काश्मीर से पूर्व को बढ़ते कैलाश, मैनाक, गन्धमादन, श्वेत जैसे नामों की विशेषता देते हुए लोहित गिरी तक गया है। 'उपयुर्परि शैलस्य बह्वीश्च सरितः शिवा: पृष्ठं हिमवतः पुण्यं ययौसप्त दशेऽहनि'
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श्रीकृष्ण ने हिमालय के विराट स्वरूप और स्थिरता को लेकर पार्थ से कहा था- हे पार्थ, मैं स्थावरों में हिमालय हूं- "स्थावराणां हिमालय "
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इसके बाद कालिदास की यह उपमा भरी पंक्ति हम सभी को आनंदित करती है- 'उत्तर दिशा का यह हिमालय तो नगाधिराज है, इसमें पवित्र देवात्मायें निवास करती हैं। यह तो पृथ्वी को मापने का मानदण्ड है'।
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