केदारनाथ में भगवान शंकर का ज्योतिर्लिंग प्राचीन काल से विद्यमान है। राजा 'भगीरथ' के विशेष प्रयासों से प्रसन्न होकर भगवती मां 'गंगा' गंगोत्री क्षेत्र में अवतीर्ण हुई हैं। हरिद्वार के पास मायापुरी में निविर्ष्ट मोक्षपुरी में दक्षकन्या भगवती पार्वती के पूर्वावतार सती ने
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दक्षयज्ञ में अपनी देह समर्पित की। बदरीनाथ के पास माणीग्राम (माणादर्रा) नामक स्थान पर व्यास जी ने वेदों के चार भाग और पुराणों की रचना की। महर्षि व्यास ने व्यासगुफा में निवास करते समय जय (महाभारत) का लेखन किया। वशिष्ठ- अरून्धती का आश्रम टिहरी गढ़वाल में था।
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उद्धवचौरी नामक ग्राम में श्रीकृष्ण से उपदेश प्राप्त कर उद्धव ने निवास किया था। बद्रीनाथ से तीन मील की दूरी पर उत्तर की ओर वैदिक सरस्वती नदी बहती थी। पाण्डवों ने अपने अन्तिम काल में देहरादून जिले के पर्वतीय क्षेत्र में निवास किया था। सत्यसन्ध नामक तपस्वी राजा ने जिस स्थान पर
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कोलासुर का वध किया, उसी स्थान पर 'श्रीनगर' बसा। 'भीलकेदार' नामक स्थान में अर्जुन की परीक्षा के लिए भगवान शंकर ने भील का रूप धारण कर उससे युद्ध किया था। सारा हिमालय प्रदेश इस प्रकार सैकड़ों पवित्र स्थानों से परिपूर्ण होने के कारण देवतात्मा कहलाता है।
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अत्यंत ज्ञनवर्धक लेख आचार्य जी। जय देवभूमि।
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