पौड़ी से लगभग 33 किलोमीटर व कोटद्वार से 73 किलोमीटर की दूरी पर पाटीसैण के निकट सड़क से 200 मीटर नवालिका नदी के बांए तट पर स्थित है "मां ज्वाल्पा का धाम"। स्कन्दपुराण के अनुसार सतयुग में दैत्यराज पुलोम की पुत्री शची ने देवराज इन्द्र को पति के रूप में प्राप्त करने के लिए
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ज्वाल्पाधाम में पर्वतराज हिमालय की पुत्री माता पार्वती की अखण्ड तपस्या की। मां पार्वती ने शची की तपस्या पर प्रसन्न होकर शची को ज्वालेश्वरी के रूप में दर्शन दिए और उसकी मनोकामना पूर्ण की। देवी पार्वती का दैदीप्यमान ज्वाल्पा के रूप में प्रकट होने के प्रतीक स्वरूप
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अखण्ड दीपक निरन्तर मंदिर में प्रज्वलित रहता है। अखण्ड ज्योति को प्रज्वलित रखने की परंपरा आज भी यथावत पूर्ण श्रद्धा और आस्था से चल रही है। यहां पर भव्य मन्दिर के अतिरिक्त सुन्दर मुख्यद्वार, तीर्थ यात्रियों की सुविधा की सुविधाहेतु धर्मशालाएं, स्नानघाट, संस्कृत विद्यालय भवन,
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छात्रावास व विद्यार्थियों के लिऐ सुव्यवस्थित क्रीड़ास्थल का भी निर्माण किया गया है। यहां पर नवरात्रे, शिवरात्रि, बसंत पंचमी इत्यादि विशेष दिवसों पर मेले का भी आयोजन होता है।
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