मैं एक छोटा सा उदाहरण देना चाहूंगा- 'नंदा राजजात हिमालय का महाकुम्भ' एक ऐसी यात्रा होती है जो पूरी दुनिया में सबसे बड़ी ऊंचाई पर होने वाली 280 किलोमीटर की पैदल यात्रा है जो 20 दिन में पूरी होती है। वह एकता का, सौहार्दता और पराक्रम का प्रतीक है।
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इस यात्रा में सारे लोग एकसाथ रहते हैं। यहां 'हिमालय' के लोग अपने घरों को इन यात्रियों के लिए खाली कर देते हैं, उनकों यह मतलब नहीं होता है कि यह यात्री कहां से आये हैं, कौन सी जाति के हैं, अच्छे हैं या खराब हैं। सारे अतिथि लोग आते हैं और लोग अपने गावों में उन्हें ठहराते हैं।
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'अतिथि देवो भवः' की यह संस्कृति है। वे मानते हैं कि 'यत्र नार्यस्तु पूजयन्ते रमन्ते तत्र देवता'। नारी का सम्मान करना हिमालय की संस्कृति में है और उसके सामने दुनिया कहीं खड़ी नहीं होती है।
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इसलिए हिमालय के इस महाकुंभ को नंदा राज जात नाम दिया था जो पूरी दुनिया के लिए एक प्रेरणा का स्त्रोत रहा है। ये परम्पराएं देश को ताकत देती हैं, जीवन को आगे बढ़ाने की प्रेरणा देती हैं।
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इसलिए यह चाहे सांस्कृतिक दृष्टि से हो, या भौगोलिक, सामरिक और आर्थिक दृष्टि से हो, इसका बहुत महत्व है।
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