मूर्ति का प्रतीक के रूप में शिलाखण्ड, वृक्ष की जड़, तना अथवा कोई लोहे या तांबे का फलक रखा होता था। प्रायः प्राकृतिक शिला को ही भावात्मक आकार प्रदान कर उससे तीर्थ सम्बन्धित अनुश्रुति या कथा का वाचन एवं श्रवण होता था।
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तीर्थ स्थल की पहचान के रूप में उस स्थान के ऊपर किसी टहनी में लाल पीली व सफेद झंडियां लगा दी जाती थी। बाल्मीकि रामायण में उल्लेख मिलता है कि तपस्वी लोग रास्ते की पहचान के लिए भी पेड़ों पर चीर बांध देते थे। उत्तराखण्ड हिमालय के सभी उच्चांश के क्षेत्रों में यही प्रथा थी।
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बदरीनाथ की व्यास गुफा, गंगोत्री और यमुनोत्री रूद्रनाथ आदि की गुफायें भारत के अन्य भागों में स्थित अमरनाथ, वैष्णोदेवी, निर्मण्ड त्रिलोकपुर, हिमाचल प्रदेश के गुफा मन्दिरों के ही समान पूर्वकाल में गुफा मन्दिर ही थे।
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अनेक स्थानों में, जहां स्वयंम्भू लिंग कहकर चट्टान की पूजा होती है, वस्तुतः ऐसे ही प्राचीनतम तीर्थ हैं, जिन पर परवर्ती युग में मन्दिर वास्तु का निर्माण हुआ है।
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