मेरा हिमालय ================ 'गढ़वाल-हिमालय' में हर साल हजारों की संख्या में पर्यटक आते हैं। यहां की सर्पनुमा सड़कें कभी नदी- घाटी तो कभी पहाड़ी- ढलानों की ओर बढ़ने लगती है।
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इस क्षेत्र में बांज, बुरांस, चीड़, देवदार, भोजपत्र, काफल, सुरई के हरे भरे वन पर्यटक को ताजी और शुद्ध हवा तो देते हैं, साथ ही पहाड़ी ढलानों पर हरियाली के आवरण से उसकी सुंदरता में चार चांद लगा देते हैं।
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ऊंची पर्वतीय ढलानों में औषधीय महत्व की वन तुलसी, सोमलता, मीठा वच, हंसराज, रतनजोत, गिलोय, कडवी, वज्रदंती, वनफशा आदि अनेक जड़ी-बूटियां बिखरी हुई है। यहां न तो 'काराकोरम' की आदियुगीन विशेषता है और न ही 'एवरेस्ट' की सुनसान सत्ता। यहां
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की पर्वतमालाएं, वन- उपवन हिममंडित शैल, शिखर, पशु-पक्षी और वनस्पतियां सभी ऐसे अलौकिक सुख की सृष्टि करते हैं जो अन्यत्र दुर्लभ है। 'गढ़वाल क्षेत्र' में धरती के गर्भ से से 'फूटते गर्म पानी के सैकड़ो सोते(स्रोत) हैं।
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गर्म पानी के यह चश्मे पर्यटकों को स्फूर्ति और ताजगी से भर देते हैं। इनमें तपोवन, बद्रीनाथ, गंगोत्री, यमुनोत्री, गंगनाणी आदि तप्तकुन्ड धार्मिक भावना से स्नान के लिए प्रयोग में लाए जाते हैं। 'गढ़वाल क्षेत्र' की भू -रचना को नदियों ने सबसे अधिक प्रभावित किया है।
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