मेरा हिमालय =============== 'हिमालय' की रोमांचपूर्ण पराकाष्ठा के बीच लगभग 16,800 फीट की ऊँचाई पर हिमशिखरों की तलहटी और शिलाखन्डों के परिवेश में एक विशाल 'झील' है 'काकभूषण्डि ताल'। 1/4
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इस झील के बारे मे मान्यता है कि यहां 'हिमालयी कौवे' अपनी देह त्यागने ऊंची उड़ान भरकर आते हैं। यह तिलिस्मों से भरी झील 'चमोली जनपद' में स्थित 'फूलों की घाटी' से कुछ दूरी पर है। 2/4
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लोकश्रुति है कि अयोध्या के एक साधारण राम भक्त ब्राह्मण को 'ऋषि लोमश' से अपनी एक भेंट में 'ब्रह्म' शब्द की व्याख्या पर उनसे असहमति होने के कारण 'लोमश ऋषि' द्वारा क्रोधित होकर ब्राह्मण को श्राप देकर 'कौवे' के रूप में भी राम भक्ति में लीन रहे। 3/4
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'काकभूषण्डि- कौवे' के रूप मे हिमालय में स्थित इसी सरोवर के तट पर वृक्ष में बैठकर 'श्री राम' कथा का वर्णन करते। सतयुग में पशु-पक्षी,देवी- देवता और मानव इस मनोरम झील के चारों और बैठते पवित्र स्नान करते तथा रामकथा को सुनते। 4/4
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