मेरा हिमालय ================ स्वर्ग से अवतरित हुई 'मां गंगा' ने जब पृथ्वीलोक का 'प्रथम स्पर्श' किया, तो वह स्थान भी 'स्वर्ग' हो गया। धरती का यह नया स्वर्ग 'उत्तराखण्ड' कहलाया। 'देवतात्माओं' की यह भूमि कालांतर में ऋषि- मुनियों की तपस्थली बनी।
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इसलिए 'देवभूमि' और 'तपोभूमि' का यह भाव इसके कण-कण मे विराजमान है। 'उत्तराखण्ड के हिमनदों' से जन्म लेती जलधारायें गंगा के प्राण हैं। यह जलशिरायें 'उत्तराखण्ड' की धरती को समृद्ध रूप देती है।
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उत्तराखण्ड में गंगा की सात धाराओं को कई अन्य छोटी-छोटी नदियों, गाड- गदेरों का सान्निध्य स्थान- स्थान पर मिला और 'देवप्रयाग' में मिली 'गंगा' को सम्पूर्णता। यद्यपि जलधाराओं के मिलन का क्रम आगे भी जारी रहा। ।
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'हरिद्वार' में कुम्भ के अमृत ने इसे 'जीवनदायिनी' के साथ-साथ 'मोक्षदायिनी' भी बना दिया ।
7:56 PM - 17 Sep 2018
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