मेरा हिमालय ============== 'हिमालय' पर विभिन्न सन्दर्भों में पाई जाने वाली दशा को देखते हुए हम कह सकते हैं कि विश्व का यह भूभाग अपने आप में भौगोलिक, भूगर्भीय, जलवायु, तथा जैवविविधता के लिए एक असामान्य क्षेत्र है जिसकी पारिस्थितिकी अत्यंत नाजुक है।
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किन्तु मानव के अनियोजित विकास संबंधी कार्यों से आज हम देख रहे हैं कि हिमालय की नाजुक पारिस्थितिकी की दशा एक चिंता का विषय बन गई है। सम्पूर्ण हिमालय भूभाग में आज जलवायु परिवर्तन, ग्लोबल वार्मिंग, हिमनदों का तेजी से पिघलना, हिमनद झीलों का बनना, वनस्पतियों का उर्ध्वगमन, फारेस्ट
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टाइप में बदलाव, मानव वन्यजीव संघर्ष, फारेस्ट फायर, पानी की कमी और जलश्रोतों का सूखना आदि समस्याएँ तो हैं ही, मानव विकास जनित भूस्खलन भी एक प्रमुख समस्या के तौर पर उभर रहा है। अतः इस अप्रतिम भूभाग के संरक्षण के निमित्त हमें अपने प्रयासों को भी समय रहते एक दिशा देनी होगी।
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अतः हिमालय के पारिस्थितिक तंत्र, हिमनदों के तेजी से पिघलने तथा जलवायु परिवर्तन की पृष्ठभूमि में हमें एक ऐसे प्रभावी तंत्र को विकसित करने की महत्ती आवश्यकता है जो वैज्ञानिक शोध को दिशा देने के साथ-साथ उपलब्ध
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आंकड़ों के दृष्टिगत नीति निर्माताओं के मध्य एक प्रभावी कड़ी के रूप में काम कर सके। हिमालयी हिमनदों, भारतीय मानसून प्रणाली, तथा जैवविविधता पर जलवायु परिवर्तन के दृष्टिगत यह
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आज प्रासंगिक हो गया है कि हिमालय पर आधारभूत आंकड़े, निष्कर्ष एवं नीतिगत प्रभावकारी रणनीति तथा तंत्र का विकास समय रहते हो जाए।
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