मेरा हिमालय ============== हिमालय में 3800 मीटर से अधिक उंचाई पर तापमान की कमी के कारण वृक्ष नहीं उगते हैं। इस ऊंचाई के बाद 4200 मीटर ऊंचाई तक बौने आकार के पौधे व घास पायी जाती है, जिन्हें स्थानीय भाषा में 'बुग्याल' या 'पयार' कहते हैं।
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बुग्याल क्षेत्र उसको कहते हैं जहां लगभग 4-6 मास तक बर्फ रहती है। बर्फ पिघलने के बाद इस क्षेत्र में मनमोहक व भिन्न-भिन्न रंगो के फूल खिलते हैं। 'बुग्यालों' का संरक्षण करना अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि यह 'जल संरक्षण' में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इस मखमली घास के बीच जल
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की बूँदे काफी लम्बे समय तक रहती हैं जो लगभग 7-8 माह तक बनी रहती है। जल की ये बूंदे आपस में मिलकर छोटे-छोटे तालाब व झरनों का निर्माण करती हैं। यह तालाब व झरने इस क्षेत्र में रहने वाले मानवों, पशुओं व वन्य- जन्तुओं के लिए जल की आपूर्ति करते हैं।
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बुग्याल क्षेत्रों में जल रिसाव काफी समय तक बना रहता है। जिसके कारण भीषण गर्मी या सूखे में भी जलापूर्ति बनी रहती है। इन बुग्याल क्षेत्रों के तालाब, झरने, नाले आदि कहीं आगे जाकर छोटी नदियों में मिल जाते हैं। मानव की अत्यधिक आवाजाही व पशु चुगने से प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
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लेकिन साथ ही जंगली वन्य -जंतु व भेड़- बकरियों के चुगने के कारण मखमली घास में वृद्धि हो जाती है क्योंकि इनसे बुग्यालों को जैविक खाद की प्राप्ति होती है। बुग्यालों की ग्राफ्टिंग हो जाती है। पुराने बुग्यालों के स्थान पर नवीन बुग्याल विकसित होते हैं।
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