वाह ***सुन्दर व सटीक उदाहरण एक साहित्यकार द्वारा ***बधाई। हरि प्रसाद सिंह संस्कार भारती, गोरखपुर से।
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साहित्यकार नहीं, चा,,,,,,,,
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कांग्रेस के समय में, 'हिन्दी सम्मेलनों' में 'विदेश जाने वाले' ज्यादातर 'अवार्ड वापसी गैंग' वाले ही थे।
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अवार्ड मिलना या वापस करना कोई बड़ी घटना नहीं
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सर जी.. अवार्ड वापसी अब नहीं हो रही है.. 10 जनपथ के इशारे पर पहले केरल वाले विद्वान और बाद में 'अशोक वाजपेयी' ने प्लान किया। यह रहस्य तो 'साहित्य अकादमी' के पूर्व अध्यक्ष, प्रख्यात साहित्यकार - प्रो. विश्वनाथ तिवारी जी' ने नेशनल मीडिया को, गत दिनों बताया।
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तिवारीजी का लेख भी मैंने ,अमर उजाला, में पढ़ा, लगा जैसे सत्ता के दलालों को खुश करने लिखा गया
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नमस्कार ***और जिन्होंने अवार्ड वापसी का नाटक किया, वह किसे खचश करने को किया? बाद में और भी मुद्दे आये लेकिन 'अवार्ड वापसी गैंग' दिखाई नहीं दिया। मोदी बन भी गये प्रधानमंत्री, किसी ने देश नहीं छोड़ा। कहीं ठिकाना ही नहीं है। ऐसे लोग सिर्फ सरकारी धन जिन्दा हैं।
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जनता सब जानती है, भगवा साहित्यकार बेनक़ाब हो रहे
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वाह साहब क्या कथन है
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