मेरा हिमालय ============== 'ऋग्वेद' के 'दशमण्डल' से ज्ञात होता है कि 'सपतसैन्धव आर्य' हिमालय की वनौषधियों, वनस्पति भण्डार की अद्भुत क्षमता से बड़े प्रभावित थे - " यस्य में हिमवन्तो......... हिमवन्तारण्ये पृथ्वी स्योतमस्तु"
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'अथर्ववेद' में सुखमय जीवन के लिए 'हिमालय' की आराधना की गयी है - " हे हिमवंत, तेरे हिमधवल पर्वत, तेरे वन, उपवन, सब हमारे लिए सुखमय हों" 'गीता' में 'श्रीकृष्ण' ने अपनी सम्पूर्णता, व्यापकता के परिचय के समाहार के अंत में कहा- "पार्थ मैं स्थावरों में हिमालय हूँ"
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'महाभारत' में वनपर्व में 'हिमालय' के विविध अंचलों के यात्रामय वर्णन हैं। पुराणों ने हिमालय के पर्वतों, महानदियों, महावनों, मद्यगुहाओं यहां पर निवास करने वाले यक्ष, गन्धर्व, किरात, किन्नर आदि जातियों, वनचरों, जीव- जन्तुओं,
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ऋषियों का धार्मिक एवं आख्यानों के अन्तर्गत विस्तृत वर्णन कर प्रत्येक भारतीय के लिए कई कोटी देवताओं के निवास महालय की यात्रा करने का धार्मिक विधान कर दिया है।
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