कीचरंध्रो में वायु का वेणुवादन, देवदारू वृक्षों के क्षीर से सुगंधित शिखर, गणिप्रदीप्त गिरि गुहाएं, किनरियों की मंथरगति, पर्वत गुहा में छिपा हुआ अंधकार, चंद्रकिरणों के समान धवलपुच्छ वाली चमरियां और मृगान्वेषी किरात- इन सभी दृश्यों और घटनाओं के बड़े ही मनोरम और यथार्थ
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चित्र खींचे हैं। मेघदूत में कालिदास ने हिमालय को प्रालेयाद्रि तथा 'गंगा' का 'प्रभव' तथा तुषारगौर पर्वत माना है- ' आसीनानां सुरभितशिलं नाभिगंधैमृगाणां तस्या एब प्रभवमचलं प्राप्य गौरं तुषारै'
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