चौड़ी पत्तियों में बांज, बुरांस, तुगला, वसिहा, धौला, कचनार आदि हैं। 'बुग्यालों' की मखमली घास, जल संरक्षण एवं भूमि अपरदन को रोकने में सहायक होती है तथा पेड़ और पौधों की पत्तियां गिरकर, जहां एक ओर वर्षा की तेज धार को रोकने में
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सहायक रहती है तथा सड़कर खाद बनाने में अधिक उपयोगी होती है। हिमालयी राज्यों में भेड़ -बकरियां एवं पालतू जानवर, जंगली जानवरों व पक्षियों के निवास होने के फलस्वरूप इनके मल मूत्र से जैविक खेती खाद प्राप्त हो जाती है।
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हिमालयी राज्यों की स्थलाकृति इस प्रकार की है कि यह जैविक खाद नदी नालों के साथ बहकर मैदानी भागों की भूमि को उपजाऊ बनाती है इसलिए सबका कहना कि हिमालय के जंगल, जल, जमीन व यहां की जवानी(युवा शक्ति) हमेशा दूसरों के काम आती हैं।
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जब भी मैदानी भागों में हिमालयी नदियों द्वारा अधिक मात्रा में बाढ़ का प्रकोप बना, वहीं दूसरी ओर मैदानी भूमि में उस समय उर्वरा शक्ति में वृद्धि हुई है।
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जय हो हिमालय पुत्र निशंक जी
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हर-हर महादेव

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