भरे हुए थे, धीरे-धीरे शान्त होने लगे। मेरा मन उसी शाश्वत भाव की ओर खिंच गया जिसकी शिक्षा हमें गिरिराज हिमालय सदैव से देता रहा है, जो इस स्थान के वातावरण में भी प्रतिध्वनित हो रहा है तथा जिसका निनाद मैं यहां की कलकल वाहिनी सरिताओं में सुनता हूं और वह भाव है त्याग"
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स्वामी विवेकानंद ने अपने 1897 के अल्मोड़ा प्रवास के दौरान हिमालय पर विचार व्यक्त किये- " हिमालय का यह स्थान हमारे पूर्वजों का देश है जिसमें भारतजननी पार्वती जी ने जन्म लिया था।
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यह वही स्थान है जहां भारतवर्ष का प्रत्येक यथार्थ सत्यपिपासु व्यक्ति अपने जीवनकाल के अन्तिम दिन व्यतीत करना चाहता है। इसी दिव्य स्थान के पहाड़ों की चोटियों पर, गुफाओं के भीतर कल-कल बहने वाले झरनों के तट पर महर्षियों ने अनेक गूढ़ भावों को खोज निकाला है।
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ડો. સાહેબ ખુબ સરસ રીતે હિમાલય ની રજૂઆત કરી.આભારસહ
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