मेरा हिमालय ================ 'मां गंगा' को अविरल बनाये रखने के लिए हिमालय में 'गोमुख' जैसा हिमनद है। इसके साथ ही जितनी भी हिमालय से निकलने वाली नदियां हैं उनको 9000 से भी अधिक ग्लेशियरों ने जीवित रखा हुआ है। इसलिए गंगा और उसकी सहायक नदियों की अविरलता निश्चित ही
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'हिमालयी ग्लेशियरों' पर टिकी हुई है। 'हरिद्वार' को मां गंगा का पहला द्वार कहा गया है लेकिन गंगोत्री, यमुनोत्री, केदारनाथ, बद्रीनाथ से गंगा में मिलने वाली सैकड़ो नदियां एवं धाराएं 'गंगाजल' को पोषित करती हैं एवं जल की मात्रा को नियंत्रित करने में बड़ी भूमिका निभाती हैं।
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हिमालय से गंगासागर तक मिलने वाली सभी नदियों से 60 प्रतिशत जल पूरे देश को मिलता है।लेकिन अब यह जल धीरे-धीरे पिछले कुछ दशकों से कम होता जा रहा है। मेरा यह मानना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी का 'नमामि गंगे' भगीरथ प्रयास है, इसकी सफलता हेतु गंगा के तट पर बसे हुए
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समाजों के साथ राज्य सरकारें को भी पूरी ईमानदारी से गंगा की अविरलता के लिए काम करना होगा। यदि इसे हासिल करना है तो हिमालय के विकास के माडल पर विचार करना जरूरी है। इसके लिए हिमालय नीति जरूरी है। ताकि गंगा की अविरलता, निर्मलता बनी रहे। इसलिए अगर 'हिमालय बचेगा तो ही बचेगी गंगा'।
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