मेरा हिमालय ================= आज 'सम्पूर्ण विश्व' जलवायु परिवर्तन, ग्लोबल वार्मिंग तथा इनके कारण 'हिमनदों' के तेजी से पिघलने को लेकर अत्यधिक चिंतित है। इसके साथ पर्याप्त विज्ञान सम्मत आंकड़ों का ना होना समस्या को उलझाने के साथ उसके न्यूनीकरण के प्रभावी प्रयासों के लिए भी एक
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रोड़ा बना हुआ है। हालांकि जलवायु परिवर्तन के उपलब्ध आंकड़े व्यापक तौर पर अत्यधिक अपक्षरण तथा हिमनदों के सिकुड़ने के कारण के तौर पर देखे जा रहे हैं। पिछले वर्षों में हिमनदों के सिकुड़ने के दृष्टिगत 'लांगतांग वैली' (नेपाल) पर हुए शोध दर्शाते हैं कि वर्तमान में हो रहे अपक्षरण
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की दर से सन् 2088 तक हिमनदों में 75 प्रतिशत द्रव्यमान हानि अथवा उनके पिघलने की सम्भावना है। 'उत्तराखंड' के 'डोकरियानी हिमनद' पर हुए शोध दर्शाते हैं कि यहां 'दिनगाड जलग्रहण क्षेत्र' में वर्षा, पहाडों पर जमी बर्फ तथा हिमनदों के पिघलने से प्राप्त
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पानी का प्रतिशत 10-26, 54-79 तथा 5.5- 7.5 प्रतिशत है। देखा गया है कि शीतकाल के मुकाबले 'दिनगाड नदी' के बहाव में 14 प्रतिशत बढ़ोतरी पूर्व- मानसून(अप्रैल- जून) तथा लगभग 8 प्रतिशत मानसून (जुलाई- सितम्बर) में दर्ज की गयी है। यह आंकड़े ग्लोबल वार्मिंग के संकेत ही हैं।
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