की वजह से यहां पर भी हिमनदों के फैलने व सिकुड़ने की गति अलग-अलग है। इसलिए यह कहना तर्कसंगत होगा कि हिमनदों व फैलना व सिकुड़ना पूरी तरह से जलवायु व स्थलाकृति पर निर्भर है। मलबे का आवरण भी हिमनदों के पिघलने की दर को कम या ज्यादा करता है।
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यदि आवरण 2 सेंटीमीटर से कम है तो पिघलने की दर अधिक होगी, यही आवरण 4 सेंटीमीटर से अधिक है तो पिघलने की दर थोड़ी कम होगी और यदि आवरण 1 मीटर से ज्यादा हो तो पिघलने की दर ना के बराबर हो जाएगी।
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क्योंकि मलबे का आवरण सूर्य के प्रकाश की धारा को रोकेगा व स्वउष्णता को भी बाहर नहीं आने देगा। यहां यह भी ज्ञात रहे की हिमालय के अधिकतर हिमनद इस श्रेणी में आते हैं।
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सर आज हिमांचल के पहाड़ो की इस्थिति देख लो रोहतांग रास्ते में दोनों और हिमखण्ड शिलाएं होती थी आज वहाँ के टूरिज्म की भृस्ट लाचार निति द्वारा रोजाना हजारो गाड़ियां रोहतांग भेजी जाती है। आज वहाँ बर्फ का नमोनिशान नही है।अधिक गाड़ियों के पौलियुशन का असर है। पहाड़ो में झरने सूखने लगे।
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हिमालय के बारे में कोई सोचता है तो हमारे यशस्वी सांसद डॉक्टर निशंक जी सोचते है आओ हम सब मिलकर हिमालय के बारे में सोचें और हिमालय के विकास के लिए कुछ करें ।
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मोदी की दीवानगी का आलम देखो लोग शादियां तक तोड़ देते है जो कहते हैं बीजेपी को छोड़ दो ओ समझ लेpic.twitter.com/NCPadENPsm
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