मेरा हिमालय ============= 'हिमालय' और 'भारतीय संस्कृति', एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। हिमालय भारत की संस्कृति का अभिन्न अंग है। केदारनाथ, बद्रीनाथ, गंगोत्री, यमुनोत्री जैसे पवित्र स्थानों में भारतीय श्रद्धा केंद्रित है।
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वेद, महाभारत और रामायण काल से ही भारतीय कथायें 'हिमालय' की चर्चाओं से भरी पड़ी हैं। 'हिमालय' ने भारत को एकता के बंधन में बांधा है। इसकी सांस्कृतिक संपदा अद्भुत है और प्राचीन काल से ही पूजनीय रही है। 'हिमालय पर्वतश्रंखला' भारतवर्ष की ऊंची चोटियों का ही नाम नहीं है।
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हिमालय हमारी संस्कृति का ही दूसरा नाम है। यहां की पवित्र जलधाराओं ने और इसके पर्वत और शिखरों ने केवल हमारी सीमाओं को ही नहीं घेरे रखा है बल्कि ये सब जलधाराएं तो इतनी पूजनीय हैं कि इसका जल तो दूर दक्षिण में रामेश्वरम् में 'शिवजी' को जल चढ़ाया जाता है।
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इस भूभाग की एकता का अनुष्ठान इस रूप में सदियों से साधा जाता रहा है, यही हमारी सांस्कृतिक व्याप्ति है, और यही हमारी सांस्कृतिक परंपरा है और यही हमारी सांस्कृतिक संबद्धता है, जिसे हमने अब तक सुरक्षित रखा है।
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