मध्य हिमालयी क्षेत्र में बांज की विभिन्न प्रजातियां 1200 मी0 से लेकर 3500 मी0 की ऊंचाई के मध्य स्थानीय जलवायु, मिट्टी व ढाल की दिशा के अनुरूप पायी जाती है। पर्यावरण को समृद्ध रखने में बांज के जंगलों की महत्वपूर्ण भूमिका है।
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बांज की जड़े वर्षा के जल को अवशोषित करने व भूमिगत करने में मदद करतीं है जिससे जलस्रोत में सतत् प्रवाह बना रहता है। बांज की पत्तियां जमीन में गिरकर दबती, सड़ती रहती हैं, इससे मिट्टी की सबसे ऊपरी परत में प्राकृतिक खाद का निर्माण होता रहता है।
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ग्रामीण कृषि व्यवस्था में भी बांज की बहुत अहम भूमिका है। इसकी हरी पत्तियां पशुओं के लिए पौष्टिक होती हैं। इंधन के रूप में बांज की लकड़ी सर्वोत्तम होती है, यह ज्यादा ताप और ऊर्जा देता है।
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बांज का जंगल जैवविविधता का अतुल भण्डार होता है, जहां नाना प्रकार की वनस्पतियां, झाड़ियां, फर्न की प्रजातियां मिलती हैं। बांज के संरक्षण व विकास के सामूहिक प्रयास हमें अभी से करने होंगे, अन्यथा वह दिन दूर नहीं जब बांज एक दिन दुर्लभ वनस्पतियों की श्रेणी में शुमार हो जाएगा।
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इसका जिम्मेदार कौन है सर।। नेता लोग पहाड़ी इलाकों से चुनाव लड़कर मैदानी इलाकों अपना आशियाना बनाते है कभी आप ने ऊपरजाकर देखा।। केवल सोशल मीडिया पर लिखने से बाज़ के पेड़ उग आएंगे या उनकी चिंता केवल यही तक है ,धन्यवाद देना चाहूंगा कि ये पहाड़ का बड़ा दुर्भाग्य है, 2019 नज़दीक है ।।
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सर उसके लिऐ नितीयाॅ होनी चाहिए , समय सीमा होनी चाहिए ,कार्य होना चाहिए,जबाब देही होनी चाहिए पर धरातल मे कुछ नही हो रहा है ,यही कटु सत्य है और स्वीकार करना चाहिए
Thanks. Twitter will use this to make your timeline better. UndoUndo
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